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महिला सशक्तिकरणः एक छलावा

‘महिला सशक्तिकरण’ शब्द का प्रयोग समाज में महिलाओं के मजबूत आधार को दर्शाने का माध्यम है। महिलाओं की प्रत्येक क्षेत्र में बढ़ती भागीदारी निःसन्देह महिलाओं की प्रगति की द्योतक है। अन्तरिक्ष से लेकर समुद्र की अथाह गहराई तक महिलाओं ने अपने अस्तित्व के प्रतीक चिन्ह स्थापित किये हैं। समाज में सम्मानीय स्थान, अधिकार व कर्तव्यों के प्रति जागरूकता, अनावश्यक प्रथाओं की बेड़ियों से मुक्ति आदि ने महिलाओं के वजूद को दृढ़ता प्रदान की है।


 हाल ही में चर्चित रूचिका हत्याकाण्ड में ‘अनुराधा’ की भूमिका ने महिलाओं में न्याय पाने के लिए बढ़ते साहस का परिचय दिया है। इस घटना ने सिद्ध किया कि अब महिलायें अन्याय सहकर चार दीवारी में घुटकर नहीं रहेंगी। उन्हें न्याय चाहिए। वो न्याय जो उनका हक है और जो न्याय स्वयं में न्यायपूर्ण हो।
 
 बात चाहे न्याय की हो या व्यवसाय की या समाज से लेकर पारिवारिक दायित्व निर्वाह करने की, महिलाओं ने सदैव स्वयं की योग्यता को सिद्ध किया है। यही कारण है कि आज बी. एस. एफ. में महिलाओं की भरती ने महिलाओं के चुनौतीपूर्ण व्यक्तित्व को और अधिक निखार दिया है। घर और बाहर दोनों चुनौतियों में खरी उतरने वाली महिलाओं ने ‘महिला सशक्तिकरण’ शब्दों की सार्थकता को प्रमाणित किया है।
 
 महिला सशक्तिकरण के सन्दर्भ में उपर्युक्त लिखे वाक्य अक्सर पढ़ने व सुनने में आते हैं। परन्तु विचारणीय बिन्दु ये हैं कि क्या वास्तव में महिला इतनी सशक्त हो गई है या हम किसी वर्ग विशेष के आधार पर सामान्यीकरण कर स्वयं को झूठी तसल्ली देने का प्रयास कर रहे हैं।
 महिला सशक्तिकरण की बात आते ही हम न जाने कितनी स्त्रियों के नाम गिनने शुरू कर देते हैं। हालांकि उनमें से कुछ वास्तव में इन शब्दों को सार्थक सिद्ध करती हैं परन्तु सोचने वाली बात यह है कि अगुलियों पर गिनी जा सकने वाली इन महिलाओं की आड़ में नित्य रूप से हारती नारियों की अवहेलना हम कैसे कर सकते हैं? सशक्तिकरण का आधार गरीब व मध्यम वर्ग होना चाहिए। परन्तु इस वर्ग से तो हर क्षण अत्याचार, शोषण, हत्या, बलात्कार से तड़पती महिलाओं की चीखों की आवाजें सुनाई देती हैं। घर, परिवार, ऑफिस से जूझती महिलाओं की चेहरे की शिकन, डर, दुख व पीडा महिला सशक्तिकरण की खोखली बुनियाद को हिलाती है।
 
 ये मात्र संवाद नहीं बल्कि स्कूल, विद्यालय, ऑफिस, परिवार, बसों व ट्रेनों की भीड़ में होते शोषण की शिकार महिलाओं की पीड़ा है। जनवरी माह में दैनिक जागरण द्वारा बसों में सफर करने वाली लड़कियों से उनके सम्मुख आने वाली समस्याओं के विषय में पूछा गया तो वे फफक उठी। उन्होंने बताया बसों में होते दुर्वव्यवहार और छेड़छाड़ की घटनाओं से वे व्यथित हैं। यदि इसकी शिकायत में पुलिस से करती हैं तो पुलिस उल्टा उन्हें ही उन गुण्ड़ों का भय दिखाकर चुप रहने की सलाह देती हैं। यदि परिवार मेें यह शिकायत की जाती है तो घर वाले घर बैठने कर पढ़ाई करने के लिए कहते हैं। ऐसे में सब कुछ चुपचाप सहने के अलावा उनके पास कोई और रास्ता नहीं है।
 
 ये ऐसी शिकायतें हैं जो कहीं दर्ज नहीं की जाती। मात्र खामोशी से सहने कर ली जाती हैं और महिला सशक्तिकरण के आंकड़ों को मजबूती प्रदान करती हैं। कोई एफ. आई. आर. न होने के कारण पुलिस भी ‘महिलाएँ सुरक्षित हैं’ का ढ़िढ़ोरा पीटती नहीं थकती। परन्तु क्या वास्तव में ऐसी कोई सुरक्षा है?
 
 महिला सशक्तिकरण आयोग ऊँचे-ऊँचे झण्डे उठाये धरने पर बैठे नज़र आते हैं। परन्तु क्या कभी ये हाथ किसी गरीब की सहायता के लिए उठे हैं? मेरठ में इंदिरा चौक के पास घटित हुए ‘एसिड केस’ की भुक्तभोगी ‘भावना और प्रतीभा’ आज भी अपनी मुफलिसी से बेहाल है। नरक सरीखी जिंदगी घसीटने वाली ये दोनों बहनें आज दाने-दाने को मोहताज हैं। अब प्रश्न ये है कि ‘महिला सशक्तिकरण आयोग’ की कृपा दृष्टि ऐसी महिलाओं पर कब पड़ेगी?
 
 महिला सशक्तिकरण पर सम्मेलन करने मात्र से सशक्तिकरण नहीं होता। महिला सशक्तिकरण या किसी भी प्रकार के सशक्तिकरण के लिए सर्वप्रथम कमजोर कड़ी को मजबूत बनाना आवश्यक होता है। और हमारे समाज की कमजोर कड़ी निम्न व मध्यम वर्ग है। उच्च वर्ग को सशक्तिकरण आयोग की आवश्यकता नहीं है। वह अपने अधिकार छीनना भी भली-भाँती जानता है। जागरूकता की आवश्यकता उन्हें है जो अपने अधिकारों को ही नहीं जानते। तो क्यों न महिला सशक्तिकरण की परिभाषा को जनसाधारण की भाषा दी जाये और महिला सशक्तिकरण की दिशा में वास्तव में प्रयास किये जायें।